मुसाफ़िर

वक़्त की हर मार मैंने
अकेले ही झेली है,

मेरी सुबह पे अब अपना
नाम रखने वालो,

मेरी तन्हा हर रातों में
मुसाफ़िर तुम ही थे क्या,

आज गुज़र कर लेते हो
बड़े ईमान से हामी भर लेते हो,

जब बिकने को हुई थी मेरी मुस्कान,
तो उसे बचाने के व्यापारी तुम ही थे क्या,

वक़्त बदल कर अगर मैंने
खुद को जिंदा रखा है अबतक,

तो मेरी रूह को तसल्ली देने
वाले हर अल्फ़ाज़ तुम ही थे क्या,

हर दौड़ में अकेले ही हार से जीत की
दिशा जो बदली है मैंने,

कल जब मै राह भटककर तेरे चौखट
तक पहुंचा था,

उस वक़्त मुझे अपना समझकर
मेरा साथ निभाने वाले तुम ही थे क्या,

आज मेरी सुबह पे अब अपना
नाम रखने वालो,

मेरी तन्हा हर रातों में
मुसाफ़िर तुम ही थे क्या,

 

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