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मुसाफ़िर

वक़्त की हर मार मैंने अकेले ही झेली है, मेरी सुबह पे अब अपना नाम रखने वालो, मेरी तन्हा हर रातों में मुसाफ़िर तुम ही थे क्या, आज गुज़र कर लेते हो बड़े ईमान से हामी भर लेते हो, जब बिकने को हुई थी मेरी मुस्कान, तो उसे बचाने के व्यापारी तुम ही थे क्या, …

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